03 December, 2014

अब   शांत  भी  हो  जाओ  ,
लगता  है  , सदियों  से ..
कुछ  बके जा  रहे  हो  ,
क्यों , 
बस  रो ना  पदो  ,
इसलिए  हसे  जा  रहे हो  !




किस  किस  से  मिलते हो , 
महफ़िलों  में  जाते  हो  
बड़ी  शिद्दत  के  साथ  ,
कभी  एक  मेहफिल  खुद  सजाओ 
और  बस  खुद  को  ही  बुलाओ  
भीड़  से  फुर्सत  मिले  ,
तो  कभी  खुद  से  भी  मिल  जाओ  !


फ़क़ीरी  सबको  नहीं  आती  ,माना 
पर आखिर  में  सब  हैं  फ़क़ीर  ही  , मान  जाओ  !

11 November, 2011


They used to tell him that he was different,still he wanders in that difference to find himself.

19 April, 2011

Talk to her

WHILE talking to her I or I should say we laughed all the time . Although she had a little more laughter always than I.I liked it very much i,e her habit of laughing all the time . Laughing at my stupid casualties , at all the conversations which were sometimes not jokeful , sometimes partially jokeful and rarely wholly jokeful but she laughed on all . She seems so nice when she laughs.

I've got one o' those conversations here, actually  to rekindle myself. I became quiet while talking on phone n this time -
After a big laughter ( especially hers), I became silent for few couples of seconds and secs seem to be several minutes on a phone talk if pass  with no words.
And then she shrieked  "hello".
A loud 'hello' , louder than normal as if she was getting me awake.
"Haan" I responded.
A long 'haaannn' , longer than normal because it was a confirmation of my presence .
"kahan so jaate ho " she was now mild again , milder than normal because it was after a loud .
"nahi yaar " I pleaded.
"kya main itni  bakwas karti hoon ki tum so jaate ho" laughingly she said.
" aisa nahi hai actually main tumhari baatein man laga  ke  sunne lagta hoon " I said casually .
"to bata diya karo kab man laga ke sun rahe ho aur kab so rahe ho " as usual she stated laughingly .
" arey !! ... sota nahi kho jata hoon ..tumhari baaton me " I chuckled . Her laughter continued , words and laughter were so profoundly mixed that I was almost unable to get her .

After this convo n laughter again I became silent for a while as per my habit , and again her loud voice sounded in my ears - "hello" louder than previous wakening 'hello' .
" haan " I replied , hesitating like an accused person who has been asked to give reason for his mistake and he has no answer.
" ab kahan man laga rahe the maine to kuchh kaha hi nahi "she had a point this time .
" arey !!! wait kar rha tha, laga ki tum kuchh kehne wali ho" more casual than previous plea. Profuse laughter ..
It was nice to talk to her.








09 March, 2011


you needn't be intense / your work should be intensive .

04 March, 2011

Result../ work..?



"People who live a result oriented life they're fakies/ because  life has only one ultimate result 'death'".

20 February, 2011

अनुनाद


एक ही कक्षा में,

एक ही दिशा में,

एक ही धुरी पर ,

एक ही तरह से घुमते हुए,

पृथ्वी भी कभी ऊब जाती होगी,

तभी फिर चाँद को छुपा कर,

कभी सूरज को ओढ़ कर

खेल खेला करती है ,

विविध -विचित्र ....
..,




और कभी घोर नैराश्य में डूब जाती होगी,

अंतस में कचोटते अवसाद ,

उत्खनन की पीढ़ा भी होगी .. क्षत -विक्षत अंगों में ,

तभी फिर विचलित होती है

कभी कराहती है ,थरथराती है,

जब दर्द उठता होगा कहीं . .

जब अंक में कुछ बल घट जाता होगा ..//




फिर सहसा ही ख़याल आता है, कहते कहते ..

सुनने वाले भी कुछ अचरज में हों शायद,

धरती की वेदना से ,

किसी का हृदय - संचार क्यों सहवास करने लगा . .

तब स्व के भाव में आकर ..कहता हूँ ,

ये कुछ नहीं ..

बस इक स्वार्थपोषित प्रयास है

अपनी घुटन को , एक दुसरे उबास से अनुनादित करने का ..!

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____shivank chaturvedi, 09 jan 11.

04 February, 2011

इंसान


मैं सड़क पर पैदल चलता हूँ
कभी कभी साइकिल पर भी निकल आता हूँ
कभी मेरे पास एक दुपहिया वाहन भी हो
सोच सकता हूँ ...
कभी मैं मजदूरी करता हूँ
कभी एक अद्दना सरकारी कर्मचारी होता हूँ
कभी बेगारी में एक छोटी मोती ही सही नौकरी हो
ख्वाब देखता हूँ ....
ऐसे ही मुझे हर जगह वक़्त पर पहुचना होता है
कभी रोटी की ज़द्दोजेहेद में
कभी बेटी के अनकहे शब्दों के लिए
और रास्ते पर डरा करता हूँ
कि कही कोई इज्ज़त और अधिकारों का पैदाईशी मालिक ,..
अपने दंभ और विलासिता के तले , मुझे रौंद ना दे !!!

आवारा जानवरों को सड़क से
हटाते हुए देखता हूँ
मन मसोस कर रह जाता हूँ
फूट फूट कर रोने को जी करता है
जो इंसान बसते हो यहाँ
उनसे कहने को जी करता है
कि मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही होता है यहाँ !!

सोचता हूँ पर समझ नहीं पाता
ये बड़ी बड़ी गाड़ियों में बैठे लोग
कुछ वक़्त क्यों नहीं देते
मुझे एक इंसान होने के लिए
जब सिग्नल बदलता है चौराहे पर
कुछ वक़्त लेता हूँ मैं आंगे बढ़ जाने में
कि अपने पैरों पर ही जिंदा हूँ अबतक
पर उनसे उन गाड़ियों में बैठे हुए भी
ये जरा सा इंतज़ार नहीं होता ..,
मौला तुने जरुर बनाया होगा इनके जैसा मुझे
पर शायद इन्हें मेरे इंसान होने का ,
ऐतबार नहीं होता ....!!!
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